Eid Mubarak

eid mubarak date 2017 celebrations bakra eid history

Written by admin

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मुसलमानों के दो प्रसिद्ध त्योहार होते हैं जिनमें से एक को ईद अथवा ईदुल फितर कहा जाता है तथा दूसरे को ईदुज्जुहा अथवा बकरईद कहा जाता है । ईद मुबारक डेट बकरा ईद इतिहास !

ईद मुसलमानों का सबसे बड़ा धार्मिक त्यौहार है। यह त्यौहार मुसलमानों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह त्यौहार पूरी दुनिया में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है।

मुसलमान इस त्यौहार को पुरे उत्साह के साथ मानते हैं।ईद की इंतज़ार हर व्यक्ति को रहता हैं। यह त्यौहार भाईचारा तथा प्रेमभाव बढ़ाने का प्रतीक हैं।

 

 

ईद कैसे मानते है ???

रमज़ान के महत्व

 

रमज़ान लोगे में प्रेमभाव तथा अल्लाह  के प्रति धार्मिक विश्वास जगाने के लिए मनाया जाता हैं । साथ ही लोगो को अन्य गलत कामो से दूर करता हैं ।

रमजान का महीना बहुत ही पवित्र माना जाता हैं। ईद का त्यौहार रमज़ान के पवित्र महीने के बाद मनाया जाता हैं।ईदुल फितर का त्योहार एक मास के रोजे रखने के बाद आता है।

रमज़ान के दिन मुसलमानो के लिए बहुत ख़ास होते हैं। रमज़ान का मुसलमानों के लिए बहुत महत्व  होता हैं, जो इस्लामिक देशो में बड़े ही जोरो  शोरो से मनाया जाता हैं।

 

इस दिनो वे पूरा दिन उपवास रखते हैं। पानी पीना भी वर्जित होता है। रोजे सुबह सहरी के साथ रखा जाता है और इफ्तार के साथ खत्म कर दिया जाता है।

रोजे रखने वाले सहरी से पहले जो खाना और पीना होता है वह कर लेते हैं। इसके बाद पूरे दिन कुछ भी खाया पिया नहीं जाता। फिर शाम को सूर्यास्त के बाद इफ्तार किया जाता है।

जिसमें रोजा खोला जाता है और उसके बाद कुछ भी खाया पिया जा सकता है।

 

शाम को नमाज़ अदा कर कर ही भोजन ग्रहण किया जाता हैं। रमजान के महीने के आखरी दिन जब आसमान में चाँद दिखाई देता है, तो उसके दूसरे दिन ईद मनाई जाती है।

 

 

ईद के  चाँद का जश्न 2017

 

चाँद का सबको बेसब्री से इंतज़ार होता हैं तथा यह चाँद सब के लिए विनम्रता तथा भाईचारे का संदेश लेकर आता है। इस चांदनी रात की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं हैं।

ईद उल फितर का त्यौहार मनाने की तैयारी पहले से ही शुरू कर दी जाती है। बच्चे व् बड़े सभी उत्साहित दिखाई देते हैं। बाज़ारों में भीड़ बढ़ जाती है।इस रात के लिए लोग बाजारो से नए नए कपड़ें खरीदते तथा सीलवटे हैं। घरों को अच्छे से सजाते हैं।

 

नमाज पढ़ने के बाद लोग आपसी भेदभाव भुला कर एक दूसरे से गले मिलते हैं और ईद की बधाइयाँ देते हैं । इस दिन दुकानों तथा बाजार दुल्हन की तरह सजे होते हैं ।

प्रत्येक मुसलमान घर के लिए मिठाइयाँ तथा बच्चों के लिए खिलौने खरीदता है । लोग अपने मित्र और सम्बधियों में मिठाइयाँ बटवाते हैं ।इस दिन को हम खुशियां मानते है नए नए कपड़े पेहेनते है अच्छे अच्छे पकवान पकाते है।

सब अपने अपने घर को साजते है। गलियों में झंडे तथा लाइट्स लगाकर चमकते है । सबसे प्यार करते है और ईद का जश्न मानते है।  ईद का त्यौहार सबके लिए खुशिया लेकर आता हैं।

 

 

ईद के स्पेशल पकवान

 

ईद की स्पेशल शीर-खुरमा और मीठी सेविया। ईद के दिन की सबसे ख़ास चीज़ मीठी सेवइयां होती हैं।  इसके साथ साथ अनेक प्रकार के व्यंजन भी बनाये जाते हैं।

लोग एक दूसरे के घर जाके गले लग कर ईद की मुबारक-बार देते हैं तथा सेव्विया खिलाकर मुँह मीठा करते हैं और एक दूसरे के साथ ईद की खुशियां बाटते हैं।

 

ईद का त्योहार हमें यही शिक्षा देता है कि हमें मुहम्मद साहब के दिखाए गए मार्ग पर ही चलना चाहिए और उन्‌की दी गयी शिक्षाओं का पालन करना चाहिए।  किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए।

ईद आपसी मिलन और भाई-चारे का त्यौहार है। इसीलिए हमे सबके साथ मिल झूल कर रहना चाहिए तथा सबके साथ भाईचारा और प्रेमभाव बनाये रखना चाहिए।

 

 

 

रोज़ा क्यों रखते है???

आखिर क्या महत्व है रोज़े का ?? क्यों रखते जाते है रोज़े ??

 

 

यह बहुत सारे लोगो के लिए होता है, खास करके नए मुस्लिमो के लिए होता है । पानी नहीं  पीते , खाना नहीं कहते, दिन में  सामने खाना है तब भी नहीं खा सकते, सामने पानी है पर नहीं पीते ,एक घुट भी नहीं पी सकते ।

क्या  इनका अल्लाह इनको इतनी तकलीफ देता है???आखिर ऐसा क्यों है? इसका क्या महत्व है और ये सब करने से क्या लाभ है ??

 

एक आदमी को अगर वाकऐ ही किसी अमल का मकसत न पता हो तो उसके अंदर हरकत वेसी पैदा नहीं होती है और वो उसका फयदा नहीं उठा पता है। तो उसे करने का क्या फयदा या उससे क्या लाभ  ??

 

रोज़ा अल्लाह ने क्यों रखा है? क्या अल्लाह को उससे ख़ुशी मिलती है ?

 

आदमी सोच सकता है के अल्लाह ने रोज़ा क्यों रखा है । उसके पास ऐसी क्या कमी है जो उसने हमे भूका रहने के लिए कहा है ।उसके पास तो सब है वो तो रसाद है फिर उसने हमे भूखा क्यों रहने को कहा है ऐसा  क्यों ??

 

अल्लाह ने इसकी वजह बताई की आखिर ऐसा क्यों है  क्यों तुमको हमे भूका रखना है।

अल्लाह ने फ़रमाया – ऐ ईमान वालो तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किये गए ताकि तुम्हारे अंदर बचने का मिजाष पैदा हो।किसी चीज़ से बचना का , उसका परहेज़ करना या अवॉयड करना का ।

आदमी नाकाम क्यों होता है – आदमी नाकाम तब होता है करने का काम न करके गैरजरूरी काम करने से या एक काम को इतनी जल्दी करना की वक़्त से पहले करना और एक काम जो वक़्त पे करना चाहिए था उसको वक़्त निकल जाने के बाद करना या नहीं करना और बाद में पछताना ।

ये सब का कारन है कि आदमी के अंदर उस काम को करने का विल पावर नहीं होता है ।कितने लोग है ,जो काम कामयाभी का तरीका जानते है । पर कर नहीं  पाते।

कितने विद्यार्थी है, जो जानते है पढाई करने से फयदा है पर वो पढाई नहीं कर पाते। लोग सब जानते होते है क्या करने से लाभ है और किस्से नहीं ,पर वह नहीं कर पाते। क्यो वो डिसिप्लिन उनकी ज़िन्दगी में  नहीं आता है??

क्यूंकि उनकी विल पावर कमजोर होता है। वो डिसिप्लिन नहीं होते है। जहा डिसिप्लिन नहीं होगा ,वहा नाकामी होगी ।थोड़ी देर का ऐश वहा मिल सकता है ,पर यह सक्सेस नहीं है, कामयाबी नहीं है। सक्सेस और एन्जॉयमेंट दो अलग चीज़ है।

एक आदमी को अगर कामयाबी चाहिए तो ज़िन्दगी में डिसिप्लिन का होना बहुत ज़्यादा जरुरी है ।

 

रोज़ा हमको डिसिप्लिन बनाता है। खाना सामने रखा हुआ है लेकिन अल्लाह ने कहा है उसको नहीं खाना है। आदमी की ज़मीनट बोल रही है ,उसको खाना है। लेकिन फिर भी वो रुक रहा है।

प्यास लग रही है उसको ,लेकिन वो  पानी नहीं पी रहा है। अपने अंदर की ज़मीनट, अंदर के जानवर  को रोक रहा है । यही वो जानवर है जो उसको गसिद्धता है और सारे ज़माने में ज़लील करता है । एक आदमी में अगर डिसिप्लिन हो तो  वह  हर जगह कामयाब होता है ।

 

रोज़े में आदमी को उसकी नेसेसिटी से रोका जाता है। ताकि वो गैरजरूरी चीज़ो से बचने का आदि हो जाये। आपकी बेसिक तथा जरुरी चीज़े अगर छोड़ते है तो गैरजरूरी चीज़े क्यों नहीं छोड़ेगे। क्यों ? अल्लाह के लिए ।

रोज़ा आपको ये बात साबित करने का मोका देता है कि अगर मेरा अल्लाह मुझे हुकम दे तो मैं मेरी जरुरत भी छोड़ दूंगा।

 

ये इस्लाम और मुसलमानो की तरफ से एक मैसेज है पूरी दुनिया के लिए।

खाना हलाल है, पानी हलाल है, सब हलाल है। सामने खाने रखे हुए है लेकिन हम नहीं खाएंगे। क्यों ? क्योकि हमारे अल्लाह का हुकम है  ,नहीं खाना है।

ये जो पाबन्दी है डिसिप्लिन है पुरे मुसलमानो में सारी ज़िन्दगी में आजाये और एक महीने की बजाये गायरा महीने के लिए आजाये ,तो आप सोच सकते है वो समाज कितना पॉवरफुल होगा। वो गलत चीज़ को बिलकुल रोकने वाला समाज होगा।

 

रोज़ा इसकी तयारी है  ,ताकि तुम्हारे अंदर बचने का, रूकने का मिजाष पैदा हो ताकि तुम डिसिप्लिन बन जाओ ।

अगर कोई आदमी डिसिप्लिन बनता है तो उसने कामयाबी के लिए सबसे एहम काम करदिया।

 

 

इसलिए रोज़े का मकसद हमें याद रखना चाहिए । ये भूके प्यासे रखने की कोई सज़ा नहीं है । जैसे किसी से नाराज होके उससे बात न करना, नहीं, ये कोई सज़ा नहीं है।

अल्लाह की तरफ से ये तो आदमी की तभियत है। ये मुस्लमान के लिए डिसिप्लिन की तभियत है ।

 

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